Turkey joins Pakistan-Saudi defense pact despite NATO membership: तुर्की नाटो मेंबर है, फिर पाकिस्तान-सऊदी के रक्षा समझौते में क्यों शामिल हुआ?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, इजराइल-ईरान के बीच संभावित युद्ध और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, इजराइल-ईरान के बीच संभावित युद्ध और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता शुक्रवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में 'मक्का जॉइंट डेररेंस एग्रीमेंट' के तहत संपन्न हुआ। इस समझौते पर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने-अपने हस्ताक्षर किए। इस समझौते की एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि यदि किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो इसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। तुर्की, जो पहले से ही नाटो का एक महत्वपूर्ण सदस्य है और इसकी दूसरी सबसे बड़ी सेना है, के इस नए समझौते में शामिल होने से कई सवाल उठते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं।
तुर्की और सऊदी अरब दोनों अमेरिका पर अपनी सुरक्षा निर्भरता को कम करना चाहते हैं। उनका मानना है कि अब केवल अमेरिकी सुरक्षा पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ईरान के साथ संभावित युद्ध और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों के कारण खाड़ी देशों में अमेरिकी सुरक्षा पर संदेह बढ़ा है। ऐसे में, यह समझौता तुर्की को एक वैकल्पिक सुरक्षा ढांचा प्रदान कर सकता है। तुर्की मिडिल ईस्ट और इस्लामी दुनिया में अपनी कूटनीतिक ताकत को मजबूत करना चाहता है। वहीं, सऊदी अरब एक बड़ा खरीददार है, जो हथियारों के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करके तुर्की और अपनी मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।













