Flood Zone Redefined: आगरा में यमुना डूब क्षेत्र फिर तय होगा

आगरा में यमुना नदी का डूब क्षेत्र अब पिछले 100 वर्षों में आई बाढ़ के आंकड़ों के आधार पर पुनः निर्धारित किया जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) द्वारा दी
आगरा में यमुना नदी का डूब क्षेत्र अब पिछले 100 वर्षों में आई बाढ़ के आंकड़ों के आधार पर पुनः निर्धारित किया जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) द्वारा दी गई निर्देशों के अनुसार, सिंचाई विभाग ने यमुना के डूब क्षेत्र में मुड्डियां लगाने का कार्य प्रारंभ कर दिया है। इस प्रक्रिया में शहर के लगभग ढाई से तीन हजार निर्माण प्रभावित होंगे, जिससे स्थानीय निवासियों में चिंता का माहौल बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यह कार्य किया जा रहा है, जिसमें 200 मीटर पर मुड्डियां लगाई जा रही हैं। यह कदम नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को गंगा और यमुना का डूब क्षेत्र निर्धारित करने के लिए भी निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यमुना नदी के किनारे हो रहे निर्माण कार्यों को लेकर सख्त निर्देश दिए हैं, ताकि पर्यावरण और नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान न पहुंचे। 100 वर्षों में आई अधिकतम बाढ़ के क्षेत्र को आधार बनाकर यह निर्णय लिया गया है। असगरपुर से प्रयागराज तक यमुना नदी पर मुड्डियां लगाने का कार्य तेजी से चल रहा है। इस प्रक्रिया में सदर तहसील के कैलाश गांव, अरतौनी, बाईंपुर, खासपुर, मनोहरपुर सहित 17 गांवों को शामिल किया गया है। इसके अलावा, अमर विहार पुलिस चौकी के पास, तनिष्क राजश्री गार्डन, मां गौरी टाउन, दशहरा घाट, मेहताब बाग, एतमादउद्दौला स्मारक की निचली कोठरियां और चीनी का रोजा क्षेत्र भी इस दायरे में आएंगे।
इस नए डूब क्षेत्र के निर्धारण के अनुसार, नदी के दाएं किनारे पर अधिकतम 5.09 किलोमीटर और बाएं किनारे पर 2.55 किलोमीटर क्षेत्र को शामिल किया गया है। पिछले 100 वर्षों में आई बाढ़ के आंकड़ों के आधार पर यह नया निर्धारण किया गया है, जबकि पहले यह आंकड़ा 25 वर्षों का था। नई मुड्डियां लगने के बाद पुरानी मुड्डियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि यमुना नदी का प्रवाह सही तरीके से बना रहे और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। इस निर्णय से स्थानीय निवासियों को अपनी संपत्तियों के बारे में चिंता हो रही है, लेकिन यह कदम दीर्घकालिक पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है।
















