A Writer of the Village: आचार्य शिवपूजन सहाय का साहित्यिक योगदान

कहते हैं, हर लेखक अपने समय का इतिहास लिखता है। कोई राजाओं का इतिहास लिखता है, कोई युद्धों का, कोई क्रांतियों का। लेकिन एक लेखक ऐसा भी था, जिसने न राजा चुना, न र
कहते हैं, हर लेखक अपने समय का इतिहास लिखता है। कोई राजाओं का इतिहास लिखता है, कोई युद्धों का, कोई क्रांतियों का। लेकिन एक लेखक ऐसा भी था, जिसने न राजा चुना, न राजधानी। उसने गांव चुना।
उसने उन पगडंडियों को शब्द दिए, जिन पर धूल उड़ती थी। उन किसानों को कहानी का नायक बनाया, जिनके नाम इतिहास की किताबों में कभी दर्ज नहीं हुए। उसने उन औरतों की चुप्पी सुनी, जिनकी आवाज चौपाल तक भी नहीं पहुंचती थी। उसने उन बच्चों की आंखों में भविष्य देखा, जिनके हाथों में किताबों से पहले हल और खुरपी आ जाती थी। वह लेखक थे आचार्य शिवपूजन सहाय।
हिंदी साहित्य में जब प्रेमचंद गांव के सामाजिक संघर्षों को कथा का केंद्र बना रहे थे, उसी समय शिवपूजन सहाय गांव की आत्मा को उसकी अपनी भाषा, अपने संस्कार और अपने स्वभाव के साथ दर्ज कर रहे थे। उन्होंने गांव को बाहर से नहीं देखा, बल्कि भीतर से जिया। 9 अगस्त 1893 को तत्कालीन शाहाबाद जिले (अब बिहार का बक्सर जिला) के उनवांस गांव में जन्मे शिवपूजन सहाय का बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता। मिट्टी, खेत, मेले, लोकगीत, किसानों का जीवन और गांव की बोलचाल उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गए। शायद यही कारण है कि आगे चलकर उनके लेखन में गांव किसी विषय की तरह नहीं, बल्कि जीवन की तरह दिखाई देता है।
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन किया, लेकिन उनका मन केवल नौकरी में नहीं रमा। उन्हें शब्दों से प्रेम था। यही प्रेम उन्हें पत्रकारिता की दुनिया में ले आया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में हिंदी पत्रकारिता एक नए दौर में प्रवेश कर रही थी। पत्र-पत्रिकाएं केवल समाचार नहीं, विचार भी गढ़ रही थीं। इसी दौर में शिवपूजन सहाय ने मतवाला, माधुरी, मर्यादा, बालक, गंगा जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से जुड़कर संपादन को नई गरिमा दी।



















