







मानव सभ्यता संवाद और संग्राम के बीच उलझी हुई है, लेकिन भारत में यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। जंतर मंतर पर हाल ही में हुए आंदोलन के बाद, पूरे देश के युवा आंद
मानव सभ्यता संवाद और संग्राम के बीच उलझी हुई है, लेकिन भारत में यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। जंतर मंतर पर हाल ही में हुए आंदोलन के बाद, पूरे देश के युवा आंदोलित हैं। वे शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से संतुष्ट नहीं हैं और पूरी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं। मौजूदा व्यवस्था में युवाओं का दम घुटने लगा है और इसी कारण वे सड़कों पर उतर आए हैं। विपक्ष संसद में उनके मुद्दों को उठाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन संसद बार-बार स्थगित होती जा रही है और इस बीच सरकार कोई नया बिल पास करने में जुटी हुई है। विपक्ष ने गृहमंत्री अमित शाह से 20 जुलाई को युवाओं पर हुए लाठीचार्ज के संबंध में संसद में बयान देने की मांग की है। हालांकि, राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के आग्रह के बावजूद गृहमंत्री सदन में आने को तैयार नहीं हैं। वे अपने कार्यालय में बैठे रहते हैं लेकिन सदन का सामना नहीं करना चाहते।
सरकार अपने अहंकार में बंद है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने एक बयान में कहा कि केंद्रीय मंत्री अमित शाह के नाम से आतंकवादी और अलगाववादी कांपते हैं। उनका यह भी कहना था कि जब वह संसद में बोलेंगे तो विपक्ष झेल नहीं पाएगा। उन्होंने विपक्ष को धमकाते हुए कहा कि मंत्रिमंडल की सामूहिक जवाबदेही होती है और यह तय करना कि कौन मंत्री बोलेगा, यह सदन के पीठासीन अधिकारी और सरकार का काम है। इस प्रकार, वे संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांत की उपेक्षा कर रहे हैं, जिसके अनुसार कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह होती है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी एक बार लोक लेखा समिति के समक्ष पेश होने की इच्छा जताई थी, ताकि टूजी घोटाले से बने संदेह को दूर किया जा सके।
इस बीच, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई के बांद्रा-कुर्ला में नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आयोजित युवा संवाद कार्यक्रम में कहा कि प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि युवा आवाज उठाते हैं तो उन्हें देशद्रोही नहीं कहा जाना चाहिए। भागवत ने यह स्वीकार किया कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांगें जायज हैं और जब उनकी मांगें नहीं सुनी गईं तो युवा आंदोलन कर रहे हैं। उन्होंने नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार बताया और कहा कि वह जेन-जी पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं।
हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या संघ परिवार और उसकी सलाह से चलने वाली सरकार के भीतर का अंतर्विरोध मौजूदा समस्या का समाधान निकाल पाएगा। क्या यह युवाओं के आक्रोश को ठंडा करने की एक रणनीति है या फिर यह हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर काम करने की योजना है? दोनों संभावनाएं हैं, लेकिन किसी सभ्यता का अपने नागरिकों से संवाद करने का यह तरीका नहीं है। संघ परिवार और कॉरपोरेट के नियंत्रण में चलने वाली व्यवस्था के संचालकों की चिंताएं दो तरह की हैं। पहली चिंता यह है कि भारतीय संस्कृति के मटमैले जल में डुबोकर वह युवाओं के सारे प्रश्नों को मार नहीं पाए। दूसरी चिंता यह है कि प्रौद्योगिकी और प्रबंधन से सहज प्रतिभाएं अब कंपनियों के विलासिता से भरे और सरोकारहीन माहौल से बाहर निकलना चाहती हैं।
हालांकि, 38 करोड़ युवाओं की प्रतिभा का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। कॉरपोरेट अब चिंतित हैं कि उन्होंने इस पीढ़ी को धूल मिट्टी से उठाकर एआई के कल्पनालोक तक पहुंचा दिया, फिर भी वह विद्रोह क्यों कर रही है। क्या भारत में युवा पीढ़ी के असंतोष और विद्रोह पर ठीक से बहस हो पाएगी? या फिर यह हाय-हाय करते हुए बिखर जाएगी? रघुवीर सहाय ने पिछली सदी के सातवें दशक में भारतीय समाज की इसी प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए लिखा था कि हर संकट भारत में एक गाय होता है।
युवाओं के विद्रोही तेवर और तर्कशीलता देखकर आशा और निराशा दोनों का संचार होता है। मोहन भागवत शायद आक्रोशित युवाओं का दिल जीतकर उन्हें संवाद की दिखावटी दुनिया में ले जाना चाहते हैं। क्या आंबेडकर और भगत सिंह के विचारों से लैस युवा संघ, सरकार और कॉरपोरेट के चक्रव्यूह का मुकाबला कर सकेंगे? क्या तेजी से परिणाम चाहने वाले युवा इस लड़ाई के लिए आवश्यक समय दे सकेंगे? भाषाविद् और समाजवादी बौद्धिक गणेश देवी का कहना है कि यह तीव्र प्रौद्योगिकी का दौर है। भारतीय सभ्यता ने विदेशी आक्रमणों का सामना किया है, लेकिन आज का दौर अधिक जटिल है। शासन करने वाले अपने ही लोग हैं, जो भारतीयता और हिंदू धर्म का चोला पहनकर छल-कपट कर रहे हैं।
अंत में, यह महत्वपूर्ण है कि युवा पीढ़ी विद्रोह की उस राह पर दृढ़ता से आगे बढ़े, जो न केवल संवाद का हिस्सा हो, बल्कि उनके अधिकारों और भविष्य के लिए एक मजबूत आधार भी बने।


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