Climate Change Impact: बिहार में हर साल 73 घंटे कम सो रहे लोग

विकास चंद्र पाण्डेय, पटना। बिहार में लोग हर साल औसतन 73 घंटे कम सो रहे हैं, जिसमें से पांच घंटे की कमी जलवायु परिवर्तन के कारण है। यह जानकारी क्लाइमेट सेंट्रल क
विकास चंद्र पाण्डेय, पटना। बिहार में लोग हर साल औसतन 73 घंटे कम सो रहे हैं, जिसमें से पांच घंटे की कमी जलवायु परिवर्तन के कारण है। यह जानकारी क्लाइमेट सेंट्रल की एक हालिया रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बिहार विश्व के उन क्षेत्रों में शामिल हो गया है, जहां लोग सबसे अधिक नींद खो रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि दक्षिण भारत के महानगरों में स्थिति और भी गंभीर है, जहां लोग प्रतिवर्ष 65 से 93 घंटे तक की नींद खो रहे हैं। चेन्नई में यह आंकड़ा 93 घंटे है, जबकि मुंबई और कोलकाता में यह क्रमशः 84 और 80 घंटे है। दिल्ली में नींद की कमी 66 घंटे रही है। इस रिपोर्ट में 1338 शहरों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें यह पाया गया है कि 2020-2025 के दौरान वैश्विक स्तर पर हर व्यक्ति ने औसतन 56 घंटे की नींद खोई है, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक की कमी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है।
रात में बढ़ते तापमान का असर विशेष रूप से 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों पर अधिक होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े शहरों में कंक्रीट के जंगल दिनभर की गर्मी को सोख लेते हैं और सूर्यास्त के बाद भी गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते, जिससे रातें गर्म हो जाती हैं। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं हुआ और शहरों को गर्मी से बचाने के लिए प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में रातें और गर्म होंगी और नींद की कमी और बढ़ेगी। गहरी नींद के लिए शरीर का तापमान 18 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए, लेकिन जब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, तो शरीर को ठंडा रखना कठिन हो जाता है, जिससे नींद में व्यवधान उत्पन्न होता है।



















