Court ruling on military pensions: सैन्यकर्मियों की दिव्यांग पेंशन नहीं रोकी जा सकती, पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि यदि किसी सैन्यकर्मी को दिव्यांगता के आधार पर मेडिकल कारणों से सेव
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि यदि किसी सैन्यकर्मी को दिव्यांगता के आधार पर मेडिकल कारणों से सेवा से बाहर किया गया है, तो उसकी दिव्यांग पेंशन को बाद में उसकी दिव्यांगता 20 प्रतिशत से कम आंके जाने के आधार पर बंद नहीं किया जा सकता है। यह निर्णय जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस अमरिंदर सिंह ग्रेवाल की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल) चंडीगढ़ के आदेश को बरकरार रखा। इस मामले में रतन चंद नामक एक सैन्यकर्मी को 31 जुलाई 1989 को क्रानिक ड्यूओडेनल अल्सर के कारण मेडिकल आधार पर सेना से बाहर किया गया था। रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता को 30 प्रतिशत आंका था, जिसे सैन्य सेवा से बढ़ी हुई माना गया था। इसके बाद, वर्ष 1994 में प्रधान नियंत्रक रक्षा लेखा (पेंशन) इलाहाबाद ने उनकी दिव्यांगता को 15 से 19 प्रतिशत आंके जाने के आधार पर 20 जून 1994 से उनकी दिव्यांग पेंशन का लाभ बंद कर दिया।
इसके बाद, आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने रतन चंद के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनकी दिव्यांग पेंशन बहाल करने और 30 प्रतिशत दिव्यांगता को राउंडिंग आफ के आधार पर 50 प्रतिशत मानकर लाभ देने का आदेश दिया। केंद्र सरकार ने इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि यह निर्विवाद तथ्य है कि रतन चंद को 30 प्रतिशत दिव्यांगता के आधार पर सेवा से बाहर किया गया था और यह दिव्यांगता सैन्य सेवा से बढ़ी हुई मानी गई थी। इसलिए, बाद में दिव्यांगता 20 प्रतिशत से कम आंके जाने के आधार पर दिव्यांग पेंशन समाप्त नहीं की जा सकती।
















