MP High Court imposes ₹50,000 fine on official for denying child care leave: महिला कर्मचारी को चाइल्ड केयर लीव देने से किया मना, मध्य प्रदेश HC ने अधिकारी पर लगाया 50 हजार का जुर्माना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी भी सरकारी विभाग का सर्कुलर या प्रशासनिक नीति अदालत के आदेश से ऊपर नहीं हो सकती। न्यायमूर
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी भी सरकारी विभाग का सर्कुलर या प्रशासनिक नीति अदालत के आदेश से ऊपर नहीं हो सकती। न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता के वकील निखिल तिवारी ने कोर्ट को बताया कि संविदा कर्मचारियों को चाइल्ड केयर लीव देने के संबंध में पहले भी कई बार स्पष्ट फैसले दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी पुराने सर्कुलरों का हवाला देकर कर्मचारियों को उनका अधिकार देने से इनकार कर रहे थे।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता को अपने वैधानिक अधिकार के लिए बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए कहा कि अदालत ही कानून की अंतिम व्याख्याकार है। जब तक किसी फैसले को बड़ी पीठ या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नहीं बदला जाता, तब तक उसका पालन करना सभी प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी है। किसी भी सरकारी सर्कुलर या विभागीय गाइडलाइन के आधार पर न्यायिक आदेशों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38 और 39 राज्य को कल्याणकारी नीतियां बनाने का दायित्व देते हैं। मध्य प्रदेश सिविल सेवा (छुट्टी) नियम, 1977 के नियम 38-सी और मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के प्रावधानों को देखते हुए संविदा कर्मचारियों को 240 दिनों तक चाइल्ड केयर लीव का लाभ मिलना चाहिए।
कोर्ट ने राज्य शिक्षा केंद्र के संचालक हरजिंदर सिंह के रवैये पर नाराजगी जताते हुए उन पर 50,000 रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया। यह राशि 30 दिनों के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा, कोर्ट ने संबंधित विभाग को चाइल्ड केयर लीव स्वीकृत करने का आदेश दिया है।














