Custody dispute resolution: पटना HC ने बच्चे की भलाई को प्राथमिकता दी

पटना हाई कोर्ट ने एक विशेष मामले में पति-पत्नी के बीच बढ़ते विवाद के बीच छह वर्षीय बच्चे की कस्टडी को लेकर एक संवेदनशील और संतुलित निर्णय लिया है। अदालत ने इस म
पटना हाई कोर्ट ने एक विशेष मामले में पति-पत्नी के बीच बढ़ते विवाद के बीच छह वर्षीय बच्चे की कस्टडी को लेकर एक संवेदनशील और संतुलित निर्णय लिया है। अदालत ने इस मामले में न केवल कानूनी पहलुओं पर ध्यान दिया, बल्कि बच्चे के भावनात्मक और मानसिक विकास को भी प्राथमिकता दी। मां ने अपने बेटे की बरामदगी के लिए याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि पिता ने बच्चे को उनकी अनुमति के बिना ले लिया है। वहीं, पिता का कहना था कि बच्चा स्वयं उनके पास आया था। इस स्थिति में, हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के दावों को सुनने के बाद, बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए एक अंतरिम व्यवस्था बनाई। न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद और न्यायाधीश आलोक कुमार सिन्हा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई चैंबर में की, जिसमें केवल पक्षकारों और उनके परिवार के सदस्यों से बातचीत की गई। अदालत ने महसूस किया कि पति-पत्नी के बीच मतभेदों का असर बच्चों पर पड़ रहा है और इसीलिए उन्होंने एक ऐसा समाधान निकाला, जिसमें बच्चे को मां का प्यार और पिता का साथ दोनों मिल सके। अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि बच्चे की देखभाल करने में दोनों अभिभावक सक्षम हैं। इस व्यवस्था के तहत, छह वर्षीय बच्चा फिलहाल मां के साथ रहेगा, लेकिन उसके पिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी। हर दिन पिता बच्चे को स्कूल छोड़ेंगे और छुट्टियों में बच्चे को अपने पास रखेंगे। इसके अलावा, लंबी छुट्टियों को भी दोनों अभिभावकों के बीच समान रूप से बांटने का निर्णय लिया गया है। इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू तब सामने आया जब अदालत ने दंपती के 12 वर्षीय बड़े बेटे से भी बातचीत की। उसने अदालत को बताया कि वह अपने पिता के साथ छुट्टियों में जाएगा और उसकी मां ने कभी उसे पिता से मिलने से नहीं रोका। अदालत ने इस भावनात्मक पहलू को भी अपने आदेश में शामिल किया। इस मामले में मां की ओर से अधिवक्ता पल्लवी पांडेय, मदन मोहन और ऋतिक शाह ने पक्ष रखा, जबकि पिता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जितेंद्र सिंह, मनीष झा और यश सिंह ने अदालत का प्रतिनिधित्व किया। राज्य की ओर से महाधिवक्ता एस.डी. संजय उपस्थित रहे। खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अंतरिम है और अंतिम निर्णय फैमिली कोर्ट में लंबित मामले के आधार पर होगा। अदालत ने फैमिली कोर्ट को छह माह के भीतर मामले का निस्तारण करने का निर्देश दिया है। साथ ही, दोनों पक्षों ने यह आश्वासन भी दिया कि वे एक-दूसरे के खिलाफ कोई नया आपराधिक मामला दर्ज नहीं कराएंगे और अदालत के समक्ष तय हुई व्यवस्था का पालन करेंगे।
















