Planned Conspiracy Behind Sambhal Violence: संभल हिंसा: सुनियोजित साजिश, काला सच और तुष्टिकरण की राजनीति

पूर्व पुलिस अधिकारी और राज्यसभा सांसद बृज लाल का मानना है कि 24 नवंबर को संभल में हुई हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी।
पूर्व पुलिस अधिकारी और राज्यसभा सांसद बृज लाल का मानना है कि 24 नवंबर को संभल में हुई हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी। संभल का इतिहास केवल विवादों से भरा नहीं है, बल्कि यह एक पवित्र स्थान भी है, जहां भगवान हरिहर नाथ का मंदिर स्थित है। इस मंदिर को 1526 में मुगल आक्रांता बाबर ने तुड़वा दिया था, और आज इसे जामा मस्जिद के रूप में जाना जाता है। इस ऐतिहासिक स्थल की वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए टीम के पहुंचने पर विरोध और उपद्रव का माहौल बनाया गया, जिससे सच्चाई उजागर होने से रोका जा सके। इस दौरान उपद्रवियों ने पुलिस और सर्वे टीम पर हमले किए, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए। दंगाइयों का उद्देश्य संभल को हिंदू-मुस्लिम दंगे में झोंकना था। हालांकि, उत्तर प्रदेश पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने तत्परता से स्थिति को नियंत्रित किया और दंगे को फैलने से रोक दिया। यह पहली बार हुआ कि घटना के तुरंत बाद 123 दंगाइयों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। एसआईटी की जांच ने इस साजिश में शामिल लोगों को बेनकाब किया, जिसमें समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क का नाम प्रमुखता से शामिल है। बर्क पर बिजली चोरी का भी आरोप है, जिसमें 1 करोड़ 91 लाख रुपये की रिकवरी की गई है। इस हिंसा के तार अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट से भी जुड़े हैं, जिसमें तारिक साटा नामक फरार अपराधी का नाम शामिल है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 28 नवंबर 2024 को एक उच्चस्तरीय जांच आयोग का गठन किया। संभल में 1920 के दशक से अब तक 16 बड़े दंगे हो चुके हैं, जिनका मुख्य कारण पिछली सरकारों की तुष्टिकरण नीतियां रही हैं। आजादी के समय संभल में हिंदू और मुस्लिम आबादी का अनुपात 45% और 55% था, लेकिन लगातार दंगों के कारण हिंदुओं की आबादी घटकर 15-20 प्रतिशत रह गई है। 29 मार्च 1978 को होली के दिन हुई भीषण हिंसा में 184 हिंदुओं की हत्या की गई थी। 1978 के दंगों के बाद से ही संभल में अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है। लेकिन आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कानून का राज स्थापित है। 24 नवंबर की घटना ने यह साबित कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
















