Express Investigation: चयन समिति के सदस्यों से जुड़ी 15 कंपनियों को मिला पैसा, टेक फंड के आवंटन में पारदर्शिता पर सवाल

केंद्र सरकार ने तकनीक के क्षेत्र में भारत को आगे बढ़ाने के लिए 22 प्राइवेट कंपनियों को लगभग 2192 करोड़ के सॉफ्ट लोन की मंजूरी दी थी। ये कंपनियां स्पेस साइंस, ऊर
केंद्र सरकार ने तकनीक के क्षेत्र में भारत को आगे बढ़ाने के लिए 22 प्राइवेट कंपनियों को लगभग 2192 करोड़ के सॉफ्ट लोन की मंजूरी दी थी। ये कंपनियां स्पेस साइंस, ऊर्जा, तकनीक, दवा और अन्य क्षेत्रों में काम करती हैं। इन 22 कंपनियों का चयन 12 सदस्यों वाली एक चयन समिति या पैनल ने किया था। लोन के लिए 124 कंपनियों ने आवेदन किया था।
इस मामले में विवाद की शुरुआत तब हुई जब इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया कि जिन 22 प्राइवेट कंपनियों को लोन मिला, उनमें से 15 कंपनियां ऐसी थीं जिनका संबंध चयन समिति के 7 सदस्यों से था, जिससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) का सवाल उठता है। इन 15 कंपनियों को 1,377 करोड़ रुपये से अधिक की फंडिंग मिली। इनमें से नौ कंपनियों का संबंध पैनल के अध्यक्ष सौरभ श्रीवास्तव से है, जो एंजेल इन्वेस्टिंग नेटवर्क (एआईएन) के संस्थापक भी हैं।
इस चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, खासकर तब जब ये 12 सदस्य प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) की निवेश समिति का हिस्सा हैं। इस समिति को नवंबर 2025 में शुरू किए गए 1 लाख करोड़ रुपये के रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (आरडीआई) फंड के लिए कंपनियों का चयन करने का कार्य सौंपा गया है। इंडियन एक्सप्रेस से संपर्क किए जाने पर पैनल के सदस्यों ने किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने हितों की जानकारी सरकार को पहले ही दे दी थी और संबंधित कंपनियों से जुड़े फैसलों से खुद को अलग कर लिया था।
इस मुद्दे को संसद में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रवीण चक्रवर्ती ने उठाया था। उनके सवालों के जवाब में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया कि चयन समिति के सदस्यों ने उन कंपनियों में अपनी वित्तीय हिस्सेदारी की जानकारी दी थी जिन्हें फंडिंग के लिए चुना गया था। चूंकि इन कंपनियों में निवेश को लेकर सवाल नहीं पूछा गया था, इसलिए सरकार ने इसकी जानकारी नहीं दी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने कहा कि कंपनियों का चयन पूरी तरह से योग्यता के आधार पर किया गया था। विभाग ने यह भी कहा कि पैनल के जिन सदस्यों का किसी कंपनी के साथ हितों का टकराव था, उन्होंने उस कंपनी के द्वारा दिए गए प्रस्ताव की जांच या मंजूरी की प्रक्रिया में भाग नहीं लिया।
















