Manusmriti Controversy: मनुस्मृति में ऐसा क्या है... क्यों बार-बार हमलों का शिकार होता है ये प्राचीन ग्रंथ

हाल ही में संसद में एक बार फिर मनुस्मृति का जिक्र हुआ, जिसने एक बार फिर से बहस को जन्म दिया है। यह प्राचीन ग्रंथ, जिसे महाराज मनु ने सहस्त्राब्दियों पहले अपने ज
हाल ही में संसद में एक बार फिर मनुस्मृति का जिक्र हुआ, जिसने एक बार फिर से बहस को जन्म दिया है। यह प्राचीन ग्रंथ, जिसे महाराज मनु ने सहस्त्राब्दियों पहले अपने ज्ञान के आधार पर लिखा था, भारतीय समाज की संरचना और उसके नियमों का पहला विधान माना जाता है। मनुस्मृति के कुछ श्लोकों को लेकर विवाद उठता रहा है, विशेषकर एक विशेष श्लोक जो शूद्रों के अधिकारों और दंडों के बारे में है। यह श्लोक गौतम धर्मसूत्र में भी पाया जाता है, लेकिन इसके संदर्भ में विद्वानों के बीच मतभेद हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में इस श्लोक का उल्लेख किया, जिसके बाद इस पर चर्चा तेज हो गई। कई विद्वानों का मानना है कि यह श्लोक मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि में नहीं है, बल्कि इसे बाद में जोड़ दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट पीएन मिश्रा ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 18वीं सदी के ब्रिटिश विद्वान पैट्रिक ओलेवेले ने मनुस्मृति की कई पांडुलिपियों का अध्ययन किया था और पाया कि विवादित श्लोक कहीं भी मूल पाठ में नहीं था। उन्होंने बताया कि यह श्लोक एक प्राचीन टीका का हिस्सा था, जिसे जूलियस जॉली ने अपने अनुवाद में शामिल किया था। इससे यह भ्रम पैदा हुआ कि यह मनुस्मृति का हिस्सा है। इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति के अध्ययन में गहराई से जाने पर कई ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो इसे समझने में मदद करते हैं।
















