








रांची। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को कम करने के लिए मीथेन गैस का उपयोग एक महत्वपूर्ण उपाय हो सकता है। इस संबंध में जानकारी साझा करते हुए आईआईटी बांबे के विजिटि
रांची। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को कम करने के लिए मीथेन गैस का उपयोग एक महत्वपूर्ण उपाय हो सकता है। इस संबंध में जानकारी साझा करते हुए आईआईटी बांबे के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. एके सिंह ने कहा कि भारत में मीथेन गैस के भंडार मौजूद हैं, जिनका सही तरीके से उपयोग नहीं किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि बंद खदानों से मीथेन गैस को निकाला जा सकता है, जिसका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जा सकता है, जैसे कि वाहनों में ईंधन के रूप में, बिजली उत्पादन में और अन्य औद्योगिक उपयोगों में। यह गैस न केवल ऊर्जा का एक स्रोत है, बल्कि इसके उपयोग से वायुमंडल में होने वाले प्रदूषण को भी कम किया जा सकता है।
डॉ. सिंह ने यह भी बताया कि धनबाद जिले में मुनीडीह खदान में कोल बेड मीथेन (सीबीएम) और कोल माइन मीथेन (सीएमएम) गैस के दोहन के लिए कार्य चल रहा है। इस संदर्भ में एसपेट के डायरेक्टर वैभव चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने नेट जीरो उत्सर्जन की बात की है, और इसके लिए हमें शोध करने की आवश्यकता है। उन्होंने अन्य देशों, जैसे चीन, पोलैंड और अमेरिका के अनुभवों का उल्लेख किया, जिन्होंने मीथेन गैस के उपयोग में सफलताएं प्राप्त की हैं।
इस राउंड टेबल कार्यक्रम में विभिन्न वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और उद्योग के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में डॉ. नीलिमा आलम ने भी अपने विचार साझा किए। इसके बाद एक तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें उद्योग, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। चर्चा में शामिल होने वालों में प्रभा एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड, झारखंड के जियो साइंटिस्ट्स, सीएमपीडीआई के अधिकारी और यूएनईपी के इंटरनेशनल मीथेन एमिशन आब्जर्वेटरी के विशेषज्ञ शामिल थे। झारखंड में उच्च रैंक का कोयला और उसके साथ मौजूद मीथेन गैस का सही तरीके से दोहन करने से न केवल ऊर्जा की समस्या का समाधान होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।
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