IIT Research Breakthrough: अम्ल-प्रतिरोधी तकनीक से दूषित पानी से निकलेगा यूरेनियम और दुर्लभ धातु

रुड़की से आईआईटी के शोधकर्ताओं ने एक नई अम्ल-प्रतिरोधी नैनोकम्पोजिट तकनीक विकसित की है, जो प्रदूषित जल से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को प्रभावी ढंग से हटाने
रुड़की से आईआईटी के शोधकर्ताओं ने एक नई अम्ल-प्रतिरोधी नैनोकम्पोजिट तकनीक विकसित की है, जो प्रदूषित जल से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को प्रभावी ढंग से हटाने में सक्षम है। इस तकनीक का उद्देश्य न केवल जल शोधन करना है, बल्कि इन प्रदूषकों को मूल्यवान संसाधनों के रूप में पुनर्प्राप्त करना भी है। आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर नितिन खंडेलवाल के नेतृत्व में यह परियोजना संचालित हो रही है। उन्होंने बताया कि अम्लीय अपशिष्ट जल में कई बार उन्नत नैनोमैटेरियल प्रभावी नहीं होते हैं, लेकिन उनकी टीम ने सक्रिय नैनोकणों के चारों ओर अम्ल-प्रतिरोधी छिद्रयुक्त सिलिका की परत विकसित की है, जिससे यह सामग्री कठिन परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। प्रयोगशाला अध्ययनों के अनुसार, यह नैनोकम्पोजिट प्रति किलोग्राम 370 ग्राम तक यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को हटाने में सक्षम है, जो इसकी उत्कृष्ट निष्कर्षण क्षमता को दर्शाता है। यह सामग्री प्राकृतिक भूजल जैसी परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से कार्य करती है और अत्यधिक अम्लीय जल में भी स्थिर बनी रहती है।
इस नई तकनीक की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका परिस्थिति-अनुकूल व्यवहार है। लगभग तटस्थ परिस्थितियों में, यह एक साथ यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों दोनों को अवशोषित कर सकती है। वहीं, अत्यधिक अम्लीय परिस्थितियों में यह विशेष रूप से यूरेनियम के प्रति चयनात्मक हो जाती है, जिससे जटिल जल मिश्रणों से रेडियोधर्मी यूरेनियम को लक्षित रूप से हटाया जा सकता है। बार-बार किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में इस सामग्री ने लगातार पांच चक्रों तक यूरेनियम हटाने की लगभग पूर्ण क्षमता बनाए रखी है। शोधार्थी भाव्या स्वामी ने बताया कि इस सामग्री में अपशिष्ट सीवेज स्लज से प्राप्त बायोचार का समावेश किया गया है, जिससे अन्यथा अनुपयोगी माने जाने वाले अपशिष्ट का उत्पादक उपयोग संभव हुआ है।



















