National Handloom Day: धागा-धागा भारत: स्वदेशी से आत्मनिर्भरता तक हथकरघे का सफर

7 अगस्त को भारत राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में एक खास विरासत को याद करता है। यह केवल कपड़ों की बात नहीं है, बल्कि उन लाखों बुनकरों की कहानी है, जिनकी मेहनत भा
7 अगस्त को भारत राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में एक खास विरासत को याद करता है। यह केवल कपड़ों की बात नहीं है, बल्कि उन लाखों बुनकरों की कहानी है, जिनकी मेहनत भारत की संस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। हथकरघा पर तैयार होने वाला कपड़ा बाजार में मिलने वाले सामान्य वस्त्रों से अलग होता है। इसके हर धागे के पीछे बुनकर का कौशल और कई घंटों की मेहनत छिपी होती है। यही कारण है कि हथकरघा भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत में हथकरघा परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। विभिन्न क्षेत्रों ने अपनी विशेष बुनाई कला विकसित की है, जैसे वाराणसी की बनारसी साड़ी, तमिलनाडु की कांजीवरम रेशम साड़ी और असम का मूगा रेशम। ये सभी परंपराएं भारतीय शिल्प की समृद्ध विरासत को दर्शाती हैं। इसके अलावा, हथकरघा की कहानी स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ी है।
7 अगस्त 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध में एक बड़ी सभा का आयोजन हुआ था, जहां स्वदेशी आंदोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया। इस आंदोलन का उद्देश्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देना था। यही स्वदेशी भावना आगे चलकर भारतीय हथकरघा और स्थानीय कारीगरों के सम्मान से जुड़ गई। इसी ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।
भारत सरकार ने 7 अगस्त 2015 को पहला राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया। इस दिन का उद्देश्य न केवल हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देना है, बल्कि उन बुनकरों और कारीगरों को सम्मान देना भी है, जो अपनी कला से भारत की पारंपरिक पहचान को जीवित रखते हैं।



















