Bihar News: जंगल घटा तो गांव में पहुंचे बाघ-तेंदुआ, गंडक नदी में कटाव से बढ़ी VTR की चिंता

बगहा (पश्चिम चंपारण) से अमित कुमार शुक्ल की रिपोर्ट के अनुसार, वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) क्षेत्र में गंडक नदी द्वारा होने वाला कटाव एक गंभीर समस्या बनता जा
बगहा (पश्चिम चंपारण) से अमित कुमार शुक्ल की रिपोर्ट के अनुसार, वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) क्षेत्र में गंडक नदी द्वारा होने वाला कटाव एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। मानसून के दौरान गंडक और अन्य बरसाती नदियों की तेज धारा जंगल के भीतर वन भूमि का क्षरण करती है, जिससे हर साल बड़ी संख्या में वनस्पति और भूमि नदी में समाहित हो जाती है। इस कटाव के कारण वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहा है, जिससे उनकी सुरक्षा और अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, गंडक नदी के कटाव से हर वर्ष औसतन 10 एकड़ से अधिक वन क्षेत्र नदी में समा जाता है। वर्ष 2015 से अब तक वीटीआर के 900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगभग 100 एकड़ जंगल कटाव की भेंट चढ़ चुका है। इस स्थिति का सीधा असर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर पड़ रहा है, जिसके कारण बाघ, तेंदुआ, भालू, गौर, हिरण और चीतल जैसे जीवों का आवास सिकुड़ रहा है। ये जानवर सुरक्षित स्थान की तलाश में जंगल से सटे आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं।
गंडक नदी की मुख्यधारा वाल्मीकिनगर रोड स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर कांटी उपखंड के पास रोहुआ नाले से मिलकर जंगल के भीतर प्रवेश करती है। इसके अलावा भपसा, मनोर जैसी पहाड़ी नदियां भी जंगल से होते हुए गंडक की मुख्यधारा में मिलती हैं। इन नदियों के कारण जंगली भूभाग का कटाव हो रहा है। कटाव का सबसे अधिक खतरा वन प्रमंडल-दो के वाल्मीकिनगर स्थित चुलभट्टा तथा मदनपुर वन क्षेत्र के कांटी उपखंड के कक्ष-एक और दो पर है। यहां गंडक नदी की धारा लगातार जंगल की ओर बढ़ रही है, जिससे महत्वपूर्ण वनखंड कटाव की जद में आ रहे हैं। वन विभाग ने इस समस्या को लेकर जल संसाधन विभाग को कई बार पत्र लिखा है, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। स्थानीय संगठनों ने भी इस मुद्दे पर आवाज उठाई है, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पाया है।
















