Court's Decision Raises Questions on Hunger: भूख की अदालत में मां की हत्या का मामला, समाज और व्यवस्था पर गंभीर सवाल

आधी सदी पहले दुष्यंत कुमार ने कहा था, 'भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ।' यह पंक्ति आज भी प्रासंगिक है, खासकर जब गुजरात उच्च न्यायालय ने एक दो साल की बच
आधी सदी पहले दुष्यंत कुमार ने कहा था, 'भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ।' यह पंक्ति आज भी प्रासंगिक है, खासकर जब गुजरात उच्च न्यायालय ने एक दो साल की बच्ची की हत्या से जुड़े मामले में विचार व्यक्त किए हैं। यह मामला उस मां से संबंधित है, जिसने अपनी बच्ची की कथित रूप से पीट-पीट कर हत्या कर दी थी, जब बच्ची ने रोटी मांगी। चार महीने बाद, अदालत ने मां को जमानत दे दी। इस फैसले ने भूख और गरीबी के मुद्दे को एक बार फिर से सामने ला दिया है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में साहित्यकारों और विचारकों के उद्धरणों का सहारा लिया। न्यायाधीश ने कहा कि भूख केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय का भी सवाल है। उन्होंने इसे समाज और व्यवस्था की सामूहिक विफलता करार दिया। अदालत ने कहा कि जब भूख एक मां को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर करती है, तो यह केवल एक अपराध नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी मानवीय और सामाजिक समस्याएं हैं।
अदालत ने अपने फैसले में पन्नालाल पटेल, चार्ल्स डिकेंस, विक्टर ह्यूगो और महात्मा गांधी जैसे विश्व प्रसिद्ध लेखकों के विचारों का हवाला दिया। अभियोजन पक्ष का कहना है कि आरोपी मां ने मार्च 2026 में अपनी बेटी की बेरहमी से पिटाई की थी, जबकि बचाव पक्ष का कहना है कि वह अत्यधिक गरीबी और भुखमरी से जूझ रही थी। न्यायमूर्ति हसमुख डी सुथार की पीठ ने कहा कि यह घटना समाज की विफलता को उजागर करती है।
अदालत ने यह भी कहा कि यह घटना सामाजिक कल्याण प्रणाली की विफलता को दर्शाती है। यह कमजोर परिवारों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए राज्य और समाज की नैतिक जिम्मेदारी को उजागर करती है। भारतीय संविधान के तहत बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि भूख से मरने देना न केवल सामाजिक विफलता है, बल्कि यह नैतिक और आध्यात्मिक विफलता भी है।
















