Double Murder Case Acquitted After 30 Years: हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा रद की

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फर्रुखाबाद में लगभग 30 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में तीन अभियुक्तों को बरी कर दिया है। यह निर्णय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विन
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फर्रुखाबाद में लगभग 30 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में तीन अभियुक्तों को बरी कर दिया है। यह निर्णय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपराध साबित करने में असफल रहा है। मामले की शुरुआत दिसंबर 1996 में हुई थी, जब नवाबगंज थाना क्षेत्र के गेहूं के खेत में दो युवकों, अवधेश और सोबरन, के शव मिले थे। पुलिस ने पुरानी रंजिश के चलते चार्जशीट दाखिल की थी। 2000 में ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्तों को दोषी मानते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई थी। इस दौरान तीन अभियुक्तों की मौत हो गई और एक को नाबालिग घोषित किया गया। अदालत ने गवाहों के बयानों और साक्ष्यों का गहराई से अध्ययन किया और पाया कि घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए गवाहों के बयान संदिग्ध और विरोधाभासी थे। अदालत ने यह भी कहा कि हत्या के हथियारों पर इंसानी खून मिला था, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि वह खून मृतकों का ही था। इसके अलावा, बरामदगी प्रक्रिया में गंभीर कानूनी खामियां भी पाई गईं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर सजा देने के लिए सभी कड़ियों का जुड़ना अनिवार्य है, जो इस मामले में गायब था। अदालत ने अधीनस्थ अदालत के फैसले को अनुमानों पर आधारित मानते हुए अभियुक्तों के निजी मुचलके रद करने का आदेश भी दिया। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायालय में साक्ष्य की गुणवत्ता और विश्वसनीयता कितनी महत्वपूर्ण होती है। यह मामला न केवल अभियुक्तों के लिए बल्कि समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है कि कैसे न्यायालय में साक्ष्यों की कमी के चलते निर्दोष लोगों को सजा नहीं दी जा सकती।
















