Indian Ambassador clarifies confusion on FCRA Bill: FCRA बिल पर भारतीय राजदूत ने दूर किए अमेरिका के सारे कन्फ्यूजन

मोदी सरकार के फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट (fcra) बिल 2026 लाने की तैयारी में है। विपक्ष इस बिल का विरोध कर रहा है और कई सवाल उठाए जा रहे हैं। सरकार का
मोदी सरकार के फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट (FCRA) बिल 2026 लाने की तैयारी में है। विपक्ष इस बिल का विरोध कर रहा है और कई सवाल उठाए जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि इस बिल के जरिए विदेश से आने वाले पैसे का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित होगा और पारदर्शी तरीके से फंड का इस्तेमाल हो सकेगा। इस बीच, अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने इस बिल से जुड़ी अफवाहों की सच्चाई बताने के लिए एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पांच मिथकों का खंडन किया।
क्वात्रा ने बताया कि पहला मिथक यह है कि भारत नागरिक समाज को मिलने वाली विदेशी सहायता को रोकने के लिए एक नया कानून बना रहा है। उन्होंने इस पर कहा कि भारत में विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि 1976 में पहला FCRA कानून आया था और यह संशोधन उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। सच्चाई यह है कि यह कानून भारतीयों को विदेशी चंदा लेने से नहीं रोकता और न ही नियमों का पालन करने वाले नागरिक संगठनों को बंद करता है।
दूसरा मिथक यह है कि FCRA ने गैर सरकारी संगठनों के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। क्वात्रा ने कहा कि FCRA के कारण भारत में विदेशी फंड का प्रवाह कम नहीं हुआ है, बल्कि यह 2010-11 में 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में 30 लाख से ज्यादा NGO हैं, लेकिन इनमें से केवल 14,450 संगठन ही FCRA के तहत पंजीकृत हैं।
तीसरा मिथक यह है कि यह कानून गैर सरकारी संगठनों की संपत्तियों की ज़ब्ती का कारण बनेगा। क्वात्रा ने कहा कि भारत ने हमेशा एक कानूनी ढांचा प्रदान किया है जिसके तहत ऐसे योगदान प्राप्त और उपयोग किए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि अगर किसी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाता है तो विदेशी अंशदान पहले से ही राज्य सरकार के प्राधिकरण के अधीन आ जाते हैं।
















