Tragic Incident in Kashmir: आतंकियों की गोलियों से दो श्रमिकों की मौत

डिजिटल डेस्क, रायपुर। रक्षाबंधन के त्योहार से कुछ दिन पहले, कश्मीर में आतंकियों की गोलियों ने दो परिवारों को बर्बाद कर दिया। दो बहनों की राखियां सूनी हो गईं, क्
डिजिटल डेस्क, रायपुर। रक्षाबंधन के त्योहार से कुछ दिन पहले, कश्मीर में आतंकियों की गोलियों ने दो परिवारों को बर्बाद कर दिया। दो बहनों की राखियां सूनी हो गईं, क्योंकि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे। यह घटना जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में हुई, जहां दीपक रात्रे और भूपेंद्र भैना नामक दो श्रमिकों की जान चली गई। ये दोनों श्रमिक छत्तीसगढ़ के निवासी थे और रोजी-रोटी की तलाश में कश्मीर गए थे। इस घटना ने उनके परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। दीपक रात्रे, जो 24 वर्ष के थे, पिछले चार-पांच वर्षों से हर सर्दी में कश्मीर के ईंट-भट्ठों पर काम करने जाते थे। उन्होंने हाल ही में शादी की थी और दो साल पहले एक बेटे के पिता बने थे। अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य की उम्मीद में, वह इस बार अपनी पत्नी सुमन और मां के साथ कश्मीर गए थे। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि उनकी यह यात्रा इतनी दुखदाई होगी।
भूपेंद्र भैना, जो 27 वर्ष के थे, तीन महीने पहले ही कश्मीर गए थे। उन्होंने अपने दो वर्षीय बेटे को दादी के पास छोड़ दिया था और अपने माता-पिता के साथ मजदूरी के लिए दूसरे राज्य में गए थे। उनकी अविवाहित बहन अन्नू ने फोन पर उनसे कहा था कि वह राखी पर जरूर आएं, लेकिन अब उनकी कलाई सूनी रह जाएगी। शुक्रवार शाम को, कुलगाम के ईंट-भट्ठे पर आतंकियों ने पहले मजदूरों से नाम और पहचान पूछी और फिर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। इस हमले में दीपक की जान चली गई और उसके बेटे के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया। इस घटना ने पूरे इलाके में मातम छा दिया।
छत्तीसगढ़ सरकार ने दोनों श्रमिकों के परिवारों को 36-36 लाख रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की है। इसमें 20 लाख रुपये छत्तीसगढ़ सरकार, 10 लाख रुपये जम्मू-कश्मीर सरकार और 6 लाख रुपये कुलगाम जिला प्रशासन की ओर से प्रदान किए जाएंगे। यह घटना केवल दो श्रमिकों की मौत नहीं है, बल्कि यह उन हजारों प्रवासी श्रमिकों के संघर्ष की कहानी है, जो रोजी-रोटी की तलाश में घर से दूर जाते हैं और कई बार लौटकर नहीं आते। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि रोजगार के अभाव में लोग कितनी दूर तक जाने को मजबूर हैं।
















