The Essence of Nathoo Lives On: तमस का नत्थू आज भी जिंदा है, बस चेहरे बदल गए हैं

नत्थू एक ऐसा नाम है, जिसकी पहचान इतिहास में विशेष नहीं है। यह नाम हर काल में सत्ता का प्रतीक बन जाता है। भीष्म साहनी ने जब 'तमस' में नत्थू का चरित्र गढ़ा था, तब
नत्थू एक ऐसा नाम है, जिसकी पहचान इतिहास में विशेष नहीं है। यह नाम हर काल में सत्ता का प्रतीक बन जाता है। भीष्म साहनी ने जब 'तमस' में नत्थू का चरित्र गढ़ा था, तब देश आजाद हुआ था। अब, आजादी के सात दशक बाद भी, हम ऐसे कई नत्थू को देखते हैं, जिनका जीवन केवल रोटी कमाने तक सीमित है। भीष्म साहनी के नत्थू का किरदार एक गरीब दलित मजदूर है, जो अपने परिवार के लिए किसी भी काम को करने के लिए तैयार है। उसका न तो कोई राजनीतिक उद्देश्य है और न ही वह किसी से घृणा करता है। नत्थू की चिंता केवल अपने और अपने परिवार के पेट भरने की है। एक राजनीतिक दल का कार्यकर्ता नत्थू को पैसे देकर सूअर मारने के लिए कहता है, यह कहते हुए कि यह किसी के भले के लिए है। लेकिन जब नत्थू द्वारा मारे गए सूअर को मस्जिद के बाहर फेंका जाता है, तो इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैल जाता है। जब नत्थू को अपनी भूमिका का पता चलता है, तो वह आत्मग्लानि से भर जाता है। भीष्म साहनी नत्थू के माध्यम से यह दिखाते हैं कि कैसे आम आदमी कई ऐतिहासिक घटनाओं का कारण बन जाता है, जबकि उसके पास खुद को विशेष समझने की कोई वजह नहीं होती। नत्थू का अपराध उसकी गरीबी है, जिसने उसे ऐसा काम करने के लिए मजबूर किया, जिसके परिणाम का उसे पता नहीं था। 'तमस' की रचना 1974 में हुई थी, और यह भारत विभाजन और उससे पहले के सांप्रदायिक दंगों पर आधारित है। 1987 में गोविंद निहलानी ने इस पर आधारित धारावाहिक बनाया, जिसने इसे व्यापक पहचान दी।
















