Sunita chooses humanity over marble throne: सुनीता ने संगमरमर के सिंहासन की जगह इंसानियत को चुना

सुनीता हर सुबह पांच बजे उठती थी। वह झुग्गी के छोटे-से कमरे में चूल्हा जलाकर पति रमेश के लिए चाय बनाती और दो रोटियां कपड़े में बांधकर घर से निकल जाती। उसका दिन क
सुनीता हर सुबह पांच बजे उठती थी। वह झुग्गी के छोटे-से कमरे में चूल्हा जलाकर पति रमेश के लिए चाय बनाती और दो रोटियां कपड़े में बांधकर घर से निकल जाती। उसका दिन कई घरों में बर्तन, झाड़ू-पोछा, कपड़े धोने और खाना बनाने में व्यतीत होता था। रमेश एक दिहाड़ी मजदूर था, जिसकी काया दुबली-पतली थी। उसकी सांवली रंगत और उभरी हुई हड्डियों के साथ मेहनत की रेखाएं उसकी पीठ पर स्पष्ट थीं। जब वह शाम को घर लौटता, तो उसकी थकान उसके कंधों से झलकती थी, लेकिन उसके चेहरे पर कभी कोई शिकायत नहीं होती।
सुनीता जिस बड़े घर में काम करने जाती थी, उसके बाहर 'केसरी नंदन शुक्ला' लिखा था। यह एक शानदार दो मंजिला मकान था, जिसमें संगमरमर की फर्श, चमचमाते झूमर और एक अलग पूजा-कक्ष था। एक दिन जब वह पूजा-कक्ष की सफाई कर रही थी, तब शुक्ला साहब स्नान करके आए। उन्होंने केवल धोती पहनी थी और उनकी चौड़ी, गोरी पीठ पर सफेद जनेऊ चमक रहा था। उन्होंने संगमरमर के बने सुंदर सिंहासन के सामने पद्मासन लगाकर बैठ गए। सिंहासन पर चांदी की मूर्तियां, पीतल के दीप, घंटियां और फूलों की मालाएं सजी थीं। धूप की महक पूरे कमरे में फैल गई।
उस दिन सुनीता के मन में एक सपना जन्मा। उसने हिम्मत करके अपने मालिक से पूछा, 'बीबी जी, यह पूजा वाला सिंहासन कितने का होगा?' मालिक ने बताया कि यह बहुत पहले लिया गया था और तब इसकी कीमत करीब पांच हजार रुपये थी। सुनीता ने मन-ही-मन हिसाब लगाया कि उसकी एक महीने की पगार लगभग पंद्रह सौ रुपये थी। उसने तय किया कि यदि थोड़ा-थोड़ा करके बचाए, तो तीन-चार महीने में पैसे जुटा सकती है।
सुनीता ने उसी दिन से पैसे जमा करना शुरू कर दिया। जब रमेश रात को खाना खाकर सो जाता, तो वह उसे देखती और सोचती कि उसकी पीठ पर जनेऊ है और वह सुबह नहा-धोकर उसी तरह संगमरमर के सिंहासन के सामने बैठा है। मकान में ऊपर की मंजिल बन रही थी और शुक्ला साहब हर शनिवार मजदूरी देते थे, लेकिन हमेशा एक सप्ताह की मजदूरी रोक लेते थे।
















