National Handloom Day: भागलपुरी सिल्क का अमेरिका-जापान में दबदबा

राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस के अवसर पर भागलपुर के विभिन्न इलाकों में बुनकरों की मेहनत और उनके अद्वितीय हुनर की गूंज सुनाई दे रही है। नाथनगर, चंपानगर, पुरैनी, नवगछिय
राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस के अवसर पर भागलपुर के विभिन्न इलाकों में बुनकरों की मेहनत और उनके अद्वितीय हुनर की गूंज सुनाई दे रही है। नाथनगर, चंपानगर, पुरैनी, नवगछिया, मीरजाफरी, दरियापुर, मिरनचक, हुसैनाबाद और मोजाहिदपुर जैसे क्षेत्रों में करघे की आवाजें भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हैं। इन क्षेत्रों के बुनकर न केवल पारंपरिक डिजाइनों को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि आधुनिक फैशन के रंग भी भर रहे हैं। लोदीपुर के युवा बुनकर भोला तांती ने अपने पूर्वजों से बुनाई का हुनर सीखा है और अब वे डिजिटल मार्केटिंग के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से सीधे जुड़ रहे हैं। कोरोना महामारी के दौरान जब बाजार बंद हो गए थे, तब भी उन्होंने अपने करघे को चलाना नहीं छोड़ा। अब वे नई पीढ़ी के युवाओं को हथकरघा बुनाई का प्रशिक्षण देकर इस पुश्तैनी कला को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।
हुसैनाबाद के बुनकर मो. सलीम अंसारी का कहना है कि उनका परिवार चौथी पीढ़ी से हथकरघा उद्योग से जुड़ा हुआ है। आज के डिजिटल युग में, जहां कंप्यूटर से ग्राफिक्स बनाए जाते हैं, वे अब भी कागज पर बने स्केच को देखकर अपने हाथों से कपड़े पर हूबहू डिजाइन उकेरते हैं। सलीम ने बताया कि पावरलूम की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण हथकरघा उद्योग पर दबाव बढ़ा है। एक साड़ी तैयार करने में कई दिनों की मेहनत लगती है, लेकिन इसके लिए मिलने वाला पारिश्रमिक संतोषजनक नहीं होता। फिर भी, अपने विरासत को बचाने के लिए बुनकर परिवार दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।


















