Tiger relocation in Rajasthan: 1928 में हुआ था पहला टाइगर रिलोकेशन का प्रयास

उदयपुर से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जब भी राजस्थान में बाघों के पुनर्वास की चर्चा होती है, तो अधिकांश लोग वर्ष 2008 को याद करते हैं। इसी वर्ष रणथंभौर से सरिस्क
उदयपुर से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जब भी राजस्थान में बाघों के पुनर्वास की चर्चा होती है, तो अधिकांश लोग वर्ष 2008 को याद करते हैं। इसी वर्ष रणथंभौर से सरिस्का तक बाघों को हेलीकॉप्टर के माध्यम से पहुंचाकर एक सफल 'टाइगर री-इंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट' की शुरुआत की गई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेवाड़ की धरती पर इससे लगभग 80 वर्ष पहले ही बाघों के पुनर्वास का एक अनूठा प्रयोग किया गया था? वन्यजीव इतिहास के विशेषज्ञ प्रो. महेश शर्मा का कहना है कि वर्ष 1928 में डूंगरपुर रियासत के महारावल लक्ष्मण सिंह ने ग्वालियर से बाघों का एक जोड़ा मंगवाकर अपने जंगलों में बसाया था। यदि यह ऐतिहासिक तथ्य आधिकारिक अभिलेखों से प्रमाणित होता है, तो यह राजस्थान के साथ-साथ देश के शुरुआती टाइगर रिलोकेशन प्रयासों में से एक माना जाएगा।
प्रो. शर्मा के अनुसार, जब महारावल लक्ष्मण सिंह मेयो कॉलेज में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, उस समय डूंगरपुर रियासत का प्रशासन ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट के हाथों में था। उस समय शिकार के शौकीन अंग्रेज अधिकारियों के कारण रियासत के अधिकांश बाघ मारे गए थे। गद्दी संभालने के बाद महारावल ने दिल्ली स्थित ब्रिटिश शासन से शिकायत की और जंगलों में फिर से बाघों को बसाने की मांग की। उस समय न तो ट्रैंक्विलाइजर गन उपलब्ध थीं और न ही आधुनिक वन्यजीव परिवहन की व्यवस्था। ऐसे में अंग्रेजों ने एक वन्यजीव आपूर्तिकर्ता की मदद से ग्वालियर से बाघों का एक जोड़ा पकड़वाने का निर्णय लिया। उन्हें पिंजरों में रेल के माध्यम से गुजरात के तलोद स्टेशन तक लाया गया, जहां से बैलगाड़ी और ट्रक के जरिए डूंगरपुर पहुंचाकर जंगल में छोड़ा गया।



















