Uttarakhand: किलमोड़े की छाल और कीमोथेरेपी का मेल ब्लड कैंसर पर असरदार, शोध में खुलासा

हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले औषधीय पौधे किलमोड़ा पर किए गए एक महत्वपूर्ण शोध में ब्लड कैंसर के उपचार के लिए नई संभावनाएं सामने आई हैं। इस शोध में बनारस हिं
हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले औषधीय पौधे किलमोड़ा पर किए गए एक महत्वपूर्ण शोध में ब्लड कैंसर के उपचार के लिए नई संभावनाएं सामने आई हैं। इस शोध में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल और सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के विशेषज्ञों ने मिलकर काम किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि किलमोड़ा की छाल के अर्क को कीमोथेरेपी की दवा डॉक्सोरूबिसिन के साथ मिलाकर देने से रक्त कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। इस अध्ययन के दौरान किए गए परीक्षणों में किलमोड़ा की छाल के अर्क और डॉक्सोरूबिसिन के संयोजन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस संयोजन से कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकने में सफलता मिली है। इसके अलावा, कीमोथेरेपी के दौरान होने वाले कुछ दुष्प्रभावों में भी कमी आई है, जो मरीजों के लिए राहत की बात है। यह शोध नेचर पब्लिशिंग ग्रुप की अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है, जो इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के माध्यम से यह भी बताया कि हिमालयी औषधीय पौधों के औषधीय गुणों पर इस तरह के शोध भविष्य में कैंसर समेत गंभीर रोगों के उपचार के लिए नई दवाओं के विकास का आधार बन सकते हैं। किलमोड़ा की छाल में मौजूद सक्रिय तत्वों की विशेषताएं इसे एक प्रभावी औषधि के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इस शोध में शामिल प्रमुख शोधकर्ताओं में डॉ. मुकेश सामंत, सुमीत सिंह, डॉ. रंजीत मनहास, डॉ. विनिता गौरी, डॉ. बिप्लब कोच और पूजा गोस्वामी शामिल हैं। इन सभी ने मिलकर इस महत्वपूर्ण खोज को संभव बनाया है। किलमोड़ा के औषधीय गुणों का अध्ययन न केवल कैंसर के उपचार में सहायक हो सकता है, बल्कि यह अन्य बीमारियों के लिए भी संभावनाएं खोलता है।



















