Climate Crisis in Kashmir: 60 वर्षों में 30% ग्लेशियर हुए लुप्त, जल संकट की चेतावनी

श्रीनगर से प्राप्त जानकारी के अनुसार, घाटी के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और बीते 60 वर्षों में 30 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर लुप्त हो चुके हैं। इस स्थिति के चल
श्रीनगर से प्राप्त जानकारी के अनुसार, घाटी के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और बीते 60 वर्षों में 30 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर लुप्त हो चुके हैं। इस स्थिति के चलते यदि ग्लेशियरों के पिघलने और सिकुड़ने की प्रक्रिया इसी तरह जारी रही, तो घाटी की अधिकांश आबादी पेयजल की सुविधा से वंचित हो जाएगी। इस गंभीर विषय पर इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के कुलपति प्रोफेसर शकील अहमद रोमशू ने एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कोलाहाई समेत घाटी के अन्य ग्लेशियरों का क्रायोस्फीयर सिकुड़ रहा है और हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम में भी महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं। रोमशू ने कहा कि पिछले छह दशकों में 30 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर मास का नुकसान हुआ है और यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक और भी अधिक ग्लेशियर लुप्त हो जाएंगे। उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग के कारण बढ़ते तापमान के प्रभावों को भी रेखांकित किया, जिससे जम्मू-कश्मीर में बर्फबारी के पैटर्न, ग्लेशियर के वॉल्यूम और नदी के बहाव में परिवर्तन आ रहा है।
रोमशू ने यह भी कहा कि इन बदलावों का प्रभाव लाखों लोगों पर पड़ेगा, जो पीने के पानी, सिंचाई और पनबिजली के लिए हिमालय से पिघलने वाले पानी पर निर्भर हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले दशकों में पानी की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि हम अनुकूलन की रणनीतियों को कितनी तेजी से अपनाते हैं। कॉन्फ्रेंस में उपस्थित पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वैज्ञानिक डॉ. जगवीर सिंह ने हाल के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा कि ग्लोबल तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 2.2 से 2.35 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। उन्होंने बताया कि तापमान में यह वृद्धि सुनने में भले ही कम लगे, लेकिन इसके प्रभाव अत्यधिक गंभीर हो सकते हैं।



















