Research reveals alarming smoke levels in Punjab: पराली जलाने से बढ़ता प्रदूषण

पंजाब में पिछले 20 वर्षों में धान की खेती में अभूतपूर्व वृद्धि ने देश को खाद्य सुरक्षा प्रदान की है, लेकिन इसके साथ ही यह राज्य के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय संकट
पंजाब में पिछले 20 वर्षों में धान की खेती में अभूतपूर्व वृद्धि ने देश को खाद्य सुरक्षा प्रदान की है, लेकिन इसके साथ ही यह राज्य के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय संकट बन गया है। 2000 से 2020 के बीच, पंजाब में धान की खेती का क्षेत्रफल लगभग 31.4 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। इस कृषि क्रांति के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि मशीनी कटाई के बाद खेतों में बचे पराली को जलाने से भारत-गंगा पट्टी, जो पंजाब से शुरू होकर बंगाल और असम तक फैली हुई है, एक गैस चैंबर में तब्दील हो रही है। इस समस्या पर हाल ही में आइआइटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स पी शुक्ला और अमेरिका के प्रोफेसर रमेश पी सिंह के नेतृत्व में शोध किया गया है। इस अध्ययन के प्रमुख शोधार्थी हरसिमरनजीत कौर रोमाना ने पहले भी पंजाब के भूजल पर शोध किया है। यह अध्ययन यूके के प्रतिष्ठित जर्नल आरएससी एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि पंजाब के लिए एक समान नीति बनाने के बजाय, अब जिला और खंड स्तर पर स्थानीय प्रबंधन रणनीतियों को अपनाने की आवश्यकता है। इससे दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत को इस दमघोंटू धुएं से राहत मिल सकेगी। अध्ययन में पाया गया है कि पराली जलाने की घटनाओं और हवा की गुणवत्ता में गिरावट के बीच एक सीधा संबंध है। उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, एक्टिव फायर काउंट और जमीन पर मौजूद प्रदूषण के स्तर में 60 से 81 प्रतिशत तक की मजबूत सांख्यिकीय समानता देखी गई है। अध्ययन के अनुसार, मालवा क्षेत्र प्रदूषण का हॉटस्पॉट बनकर उभरा है, जबकि माझा और दोआबा क्षेत्रों में भी प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है।



















