National Handloom Day 2026: बनारस के बुनकरों की स्थिति में सुधार, लेकिन चुनौतियाँ बनी हुई हैं

नेशनल हैंडलूम डे हर साल 7 अगस्त को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य बुनकरों की जिंदगी में खुशहाली लाना और स्वदेशी को बढ़ावा देना है। 2015 में इसकी शुरुआत के बाद से
नेशनल हैंडलूम डे हर साल 7 अगस्त को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य बुनकरों की जिंदगी में खुशहाली लाना और स्वदेशी को बढ़ावा देना है। 2015 में इसकी शुरुआत के बाद से, बुनकरों की स्थिति में सुधार के संकेत मिले हैं। जीआई एक्सपर्ट पद्मश्री डॉ. रजनीकांत के अनुसार, 1990 से 2010 तक बुनकरों की स्थिति चिंताजनक थी, लेकिन अब हालात में सुधार हो रहा है। हाल के वर्षों में, हैंडलूम उत्पादों की मांग में वृद्धि हुई है, और कोविड-19 के बाद बुनकरों की संख्या में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
बनारसी साड़ी उद्योग में पिछले पांच वर्षों में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हैंडलूम साड़ियों पर मुनाफा दोगुना हुआ है, जिससे बुनकरों को प्रतिदिन 800 से 1000 रुपये की आय हो रही है। कढ़ुआ और तीन-चार रंगों वाली साड़ियों की मजदूरी अब 1000 रुपये से अधिक है, जबकि पांच वर्ष पहले यह 400 रुपये थी। हालांकि, बुनकरों के लिए न्यूनतम मजदूरी तय नहीं हुई है, जिससे उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
डॉ. रजनीकांत ने बताया कि जीआई टैगिंग के बाद बनारसी साड़ी की ब्रांडिंग में सुधार हुआ है, जिससे उपभोक्ता अब हैंडलूम उत्पादों की तलाश कर रहे हैं। सरकार द्वारा विभिन्न आयोजनों के माध्यम से हैंडलूम का प्रमोशन भी किया जा रहा है। लेकिन अमरेश मौर्या जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि हैंडलूम और पावरलूम के बीच अंतर स्पष्ट नहीं है, जिससे हैंडलूम को नुकसान हो रहा है।
बुनकर हाजी ओकास अंसारी ने बताया कि आज बुनकर 15-20 दिन काम करने पर भी खुश हैं, लेकिन सूरत और बेंगलुरु के पावरलूम उत्पादों के मुकाबले वे कीमत नहीं दे पा रहे हैं। उन्होंने नकल पर रोक लगाने की जरूरत पर जोर दिया।


















