Government controls drug prices, but what about quality?: दवा की कीमत पर सरकार कंट्रोल करती है, लेकिन क्वालिटी का क्या?

गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में दवाओं पर होने वाला खर्च आम परिवार के बजट पर बड़ा असर डाल सकता है। अक्सर सरकार से जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों को कंट्र
गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में दवाओं पर होने वाला खर्च आम परिवार के बजट पर बड़ा असर डाल सकता है। अक्सर सरकार से जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों को कंट्रोल करने की मांग की जाती रही है। इसी संदर्भ में लोकसभा में सांसद हनुमान बेनीवाल और राजकुमार रावत ने सरकार से सवाल किया है कि गंभीर बीमारियों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी पूछा कि क्या बाजार में बिकने वाली हर दवा गुणवत्ता के निर्धारित मानकों पर खरी उतर रही है।
मिनिस्ट्री ऑफ केमिकल और फर्टिलाइजर्स ने इस सवाल का जवाब देते हुए बताया कि दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO, 2013 के तहत नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) कार्यरत है। वहीं, दवाओं की गुणवत्ता और नकली या मिलावटी दवाओं की निगरानी के लिए ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और उसके तहत बने नियम लागू हैं।
सरकार जरूरी दवाओं की कीमत तय करने के लिए नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) को आधार बनाती है। इस सूची में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत यानी सीलिंग प्राइस, NPPA द्वारा तय की जाती है। इन दवाओं को शेड्यूल्ड दवाएं कहा जाता है, जिसका अर्थ है ऐसी दवा, जिसकी बिक्री, खरीद, वितरण या इस्तेमाल पर सरकार के विशेष नियम लागू होते हैं।
शेड्यूल्ड दवाओं की कीमत हर साल होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) के आधार पर तय की जाती है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, WPI के आधार पर कीमत बढ़ाने की सीमा 2024 में 0.00551%, 2025 में 1.74028% और 2026 में 0.64956% रही है। इसका अर्थ है कि दवाओं की कीमत पर पूरी तरह रोक नहीं है। सरकार हर साल तय करती है कि कंपनियां Scheduled दवाओं की कीमत कितनी बढ़ा सकती हैं। कंपनियां इस तय सीमा से ज्यादा कीमत नहीं बढ़ा सकतीं।
हालांकि, सभी दवाएं Schedule-I में शामिल नहीं होतीं। जो दवाएं इस सूची में नहीं आतीं, उन्हें नॉन-शेड्यूल फॉर्मूलेशन कहा जाता है। इन दवाओं की कीमत बढ़ाने की भी एक सीमा तय है। सरकार के नियम के अनुसार, कोई कंपनी पिछले 12 महीनों की MRP के मुकाबले इन दवाओं की कीमत में एक साल में 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं कर सकती। लेकिन बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में इन दवाओं की कीमत औसतन हर साल 6.94 फीसदी बढ़ी है।
जनता के लिए दवाओं की कीमत ही नहीं, गुणवत्ता भी एक बड़ी चिंता का विषय है। सस्ती दवा तभी उपयोगी होती है जब वह गुणवत्ता के तय मानकों पर खरी उतरे। सरकार द्वारा लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वित्तीय वर्षों में देशभर में बड़ी संख्या में दवाओं के सैंपल की जांच की गई है। दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण को ड्रग्स और कॉस्मेटिक एक्ट, 1940 और ड्रग्स और कॉस्मेटिक रुल्स, 1945 के तहत नियंत्रित किया जाता है। दवा निर्माण, बिक्री और वितरण के लाइसेंस संबंधित राज्यों के स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी यानी SLA द्वारा जारी किए जाते हैं। यदि किसी कंपनी या फर्म में नियमों का उल्लंघन मिलता है, तो लाइसेंस निलंबित या रद्द किया जा सकता है।
सरकार के आंकड़े बताते हैं कि दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक व्यवस्था मौजूद है, लेकिन दवाओं की उपलब्धता के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता भी आवश्यक है। पिछले तीन वर्षों में 3 लाख से ज्यादा सैंपलों की जांच की गई है, जिसमें हजारों सैंपल मानकों के अनुरूप और नकली या मिलावटी पाए गए। इसलिए आम मरीज के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि दवा कितनी सस्ती है और क्या दवा तय गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरती है या नहीं।



















