Cultural Workshop in Kashi: काशी में कजरी कार्यशाला का समापन, मालिनी अवस्थी ने परखी संगीत साधकों की प्रतिभा

वाराणसी में मां गंगा की गोद में स्थित रविदास घाट पर बुधवार को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित कजरी कार्यशाला का समापन हुआ। इस कार्यक्रम में संगीत साधकों ने गुरु
वाराणसी में मां गंगा की गोद में स्थित रविदास घाट पर बुधवार को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित कजरी कार्यशाला का समापन हुआ। इस कार्यक्रम में संगीत साधकों ने गुरु-शिष्य परंपरा को याद करते हुए स्वरांजलि अर्पित की। पांच दिवसीय इस कार्यशाला में प्रतिभागियों ने ठुमरी, चैती और कजरी जैसे लोक संगीत की बारीकियों को सीखा और इसे सधे सुर, लय और तान के साथ प्रस्तुत किया। प्रख्यात लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने इस कार्यशाला में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से लोक परंपरा को बढ़ावा मिलता है और नई पीढ़ी को संगीत की गहराई से परिचित कराया जाता है। कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों और सिंगापुर से आए प्रतिभागियों ने भाग लिया, जो सभी आयु वर्ग के थे।
समापन समारोह के दौरान पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने ठुमरी गीत पर अलाप किया, जिसके बाद प्रतिभागियों ने 'झूला धीरे से झूआ ओ बनवारी' और 'कजरी अब बरखा बहार के आई गईले ना' जैसे गीतों की बेहतरीन प्रस्तुति दी। इस दौरान क्रूज पर मौजूद प्रतिभागियों ने भी अपने आप को थिरकने से नहीं रोक पाए। अवधी लोकगीत 'हे री सखी, निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर' ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। मालिनी अवस्थी ने कलाकारों को सुरों की उठान, शब्दों के उच्चारण और भाव-भंगिमा के महत्व के बारे में बताया। इस कार्यक्रम में हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र, सितार पर नीरज मिश्र, तबला पर रत्नेश मिश्र और ढोलक पर राजेश मिश्र ने साथ निभाया।



















